दारिद्र्य

दारिद्र्य

बार-बार अरुचि दिखाने के बाद भी उस आदमी ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा। वह सोच रहा था शायद हम उसे पेशेवर गाइड मान रहे थे, इसलिए पहले से ही उसने अपनी सफाई में कहना शुरु किया कि वह इस कार्य के लिए उनसे कोई पैसे नहीं लेगा। वह यह भी कह रहा था कि इन सभी चीजों के पीछे उसका कोई गलत उद्देश्य नहीं है। वह तो केवल उन्हें दो हजार साल पुरानी एक पुरातात्विक जगह पर घुमाने ले जाएगा और उसको दिखाने के बाद वह उन्हें एक अन्य जगह पर ले जाएगा। वह उन जगहों को गोपनीय नहीं रख रहा था। वह क्षेत्र साड़ी के लिए प्रसिद्ध होने की वजह से वह उन्हें कुछ तांती (बुनकर) परिवारों के घर घुमाना चाहता था जहाँ हम अपनी आँखों से साड़ियों के बुनने की प्रक्रिया को देख सके। अपना उद्देश्य स्पष्ट करने के बाद उसने कहा कि हमारे लिए साड़ी खरीदना कोई अनिवार्य नहीं है।
हो सकता है वह किसी साड़ी कंपनी का दलाल हो अथवा गाइड, उसकी यह इमेज बनने पर भी हमारे मन में उसके प्रति कोई अच्छी धारणा नहीं बन पाई थी, क्योंकि पहला तो, दो हजार साल पुरानी धरोहरों को देखने में हमारी कोई रुचि नहीं थी, दूसरा साड़ी खरीदना हमारे बजट से बाहर की चीज थी। अभी हमारे लिए घूमने-फिरने के बहुत सारे स्थल बचे हुए थे। वापिस जाने का टिकट भी नहीं बना था हमारा। अभी तक हमने होटल का किराया भी नहीं चुकाया था। यही वजह थी कि हम जैसे पर्यटकों के लिए साड़ी खरीदना भी एक विलासिता की श्रेणी में आता था।
ऐसा लग रहा था कि उसने हमारे मन की बात पढ़ ली है और बारम्बार वह यही बात दोहरा रहा था कि साड़ी खरीदना हमारे लिए कोई जरुरी नहीं है। केवल एक बार उस जगह को देख लेने से भी चलेगा।
उसकी ये मीठी-मीठी बातें हमारे दिल में संदेह पैदा कर रही थी। हमारे लिए यह एक नई जगह थी, दूसरा हम पर्यटन में निकले थे। अगर उसने किसी तरह जोर-जबरदस्ती कर हमसे पैसे ऐंठ लिए, तो वापिस उड़ीसा जाना एक टेढ़ी खीर हो जाएगी।
बहुत बार मना करने के बाद भी एक बदमाश की तरह वह आदमी हमारे पीछे हाथ-धोकर पड़ गया था। जब हम यह चाह रहे थे कि यहाँ की मिट्टी, पत्थर, र्इंट, पेड़-पौधों को स्पर्श कर दो हजार साल पुराने अतीत में खो जाए, तब हमें ऐसा लग रहा था कि दो हजार साल पहले यहाँ कोई बुद्ध सन्यासी भरी दुपहरी में खड़ा होकर दर्शनशास्त्र की व्याख्या करने में व्यस्त होगा। उस समय इस विनम्र व्यक्ति की उपस्थिति भी हमारे लिए असह्र हो जा रही थी। वह व्यक्ति जो इस जगह के इतिहास के बारे में बता रहा था, उसका विवरण पुरातत्व विभाग द्वारा प्रस्तुत जानकारी से कतई मेल नहीं खा रहा था और हम लोग बार-बार इसको उसके गलत विवरण प्रस्तुत करने के लिए टोक रहे थे। उस आदमी से कब पीछा छूटेगा, सोचकर हम अधीर होते जा रहे थे।
ठीक उसी समय, हमारे बच्चों को तेज प्यास लगी और वे पानी पीने की जिद्द करने लगे। बाद में पता चला कि इस प्रांगण में पीने का पानी मिलना मुश्किल है। पानी पीने के लिए हमें मुख्य दरवाजे से बाहर जाना पड़ेगा और इस प्रांगण में लौटने के लिए हमें प्रति व्यक्ति दो रुपए का टिकट खरीदना पड़ेगा।
शायद वह आदमी इसी समय का इंतजार कर रहा था। वह कहने लगा कि उसे एक ऐसा रास्ता मालूम है जिस रास्ते से जाकर पानी पीकर वापिस आया जा सकता है। यद्यपि वह जगह इस प्रांगण की परिसीमा के बाहर है, फिर भी हम लोग एक जगह से तारबंदी के घेरे के नीचे से होकर जा सकते हैं, पानी पीकर वहाँ से बिना प्रदर्शनी-टिकट खरीदे यहाँ लौट सकते हैं। किन्तु......
किन्तु ?
किन्तु, यह जगह वही है जो वह आदमी हमें दिखाना चाहता था। सरोजिनी कहने लगी, "चलिए, उस जगह को थोड़ा देख लेते हैं। बच्चें भी प्यास से बिलखने लगे हैं।"
"लेकिन हम साड़ी नहीं खरीदेंगे।" मैने अपनी इस शर्त को एक बार फिर से उसको याद करवा दिया। उस आदमी ने हमारी शर्त को मान लिया। हम लोग एक चिकने पैगोड़ा के भीतर से होते हुए वहाँ से बाहर निकल गए।बाहर जाने के बाद हमें एक सँकरा रास्ता मिला। उस रास्ते से वह हमें टीन की चद्दरों से बने हुए एक पुराने परिव्यक्त बस-स्टैंड की तरफ लेकर गया। वहाँ ना तो कोई बस खड़ी होती थी, ना ही बसों का इंतजार करते यात्रीगण दिखाई दे रहे थे। रास्ते के किनारे गंदे पानी का नाला बह रहा था। कीचड़ में से उठकर आती हुई भैंसे, नंगे बच्चों, रास्ते पर सोई हुई गायों को पार करते हुए हम एक झुग्गी-झोंपड़ी में पहुँचे। बिना किसी दुविधा के उस आदमी ने हमें घर के भीतर बुलाया। घर के भीतर पावरोटी खाते हुए लड़के, ढेंकी कूटती हुई एक स्त्री तथा साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए दूध पिलाती बच्चे की एक माँ, उन सभी की तरफ बिना देखे हम उस आदमी का अनुसरण करते रहे। हमें वहाँ देखकर उन लोगों को आश्चर्य होने लगा। वे लोग हमे कौतूहल भरी निगाहों से देखने लगे। उस अस्वास्थ्यकर परिवेश में बच्चों को कहीं संक्रामक रोग न लग जाए, सोचकर सरोजिनी कदम-कदम पर बच्चों की तरफ देखने लगी।
वह आदमी हमें एक अंधकारमय घर के भीतर लेकर गया तथा एक करघे के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। वहाँ एक बूढ़ा कपड़ें बुनने में मग्न था और बाहर के रास्ते में एक आधी बुनी हुई साड़ी रखी हुई थी। अगर वहाँ करघा चलता हुआ नहीं मिलता , तो वह जगह किसी संग्रहालय के नृतत्व विभाग से कम नहीं लगती। वह आदमी कहने लगा , "देख रहे हो, यह साड़ी जो अभी बुनी जा रही है। अगर आप यहाँ से खरीदते हो तो उसकी कीमत नौ सौ रुपए पड़ेगी। और अगर आप इसे किसी साड़ी की दूकान से खरीदते हैं तो महाजन आपसे बारह सौ से तेरह सौ रुपए लेगा।" नौ सौ रुपए की साड़ी बुनने वाले बूढ़े आदमी की शरीर की सारी हड्डियाँ दिख रही थी। वह एक फटी-पुरानी गंजी तथा मैली लुंगी पहने हुए था। उस आदमी के पास में पड़ी हुई थी एक कटोरी में लाल चाय। हो सकता है वह उसे पीना भूल गया हो। तभी अंधेरे में से साड़ियों का एक ढेर उठाकर हमारे सामने रख दिया उस गाइड ने। वह कहने लगा, "आइए, बाहर उजाले में इन साड़ियों को देखिए।
इसे देखिए, इस साड़ी का दाम आठ सौ रुपए है। इसका बार्डर देखिए, कितना सुंदर है ! इस साड़ी का दाम छ सौ रुपए है इसके बीच वाले हिस्से को तो देखिए इसका पल्लू देखिए। इसका दाम पाँच सौ रुपए।"
धीरे-धीरे साडियों के दाम गिरते जा रहे थे। पाँच सौ से चार सौ, साढ़े तीन सौ, फिर दौ सौ नब्बे रुपए। सरोजिनी धीरे स्वर में कहने लगी, "दौ सौ नब्बे रुपए में साड़ी सस्ती है ना ?
यह साड़ी हमें अपने वहाँ छ सौ रुपए से कम में नहीं मिलेगी।"
दौ सौ नब्बे रुपए तो बहुत होते हैं। ऐसे में शायद समझ में नहीं आता, मगर तीन सौ रुपए का मतलब होटल में चार दिन रुकने का भाड़ा। इतने रुपयों में हम वापिसी का रेल-टिकट कटा सकते हैं।
आँखों के इशारों से मैने सरोजिनी को अपने साड़ी के प्रति मोह को काबू में करने को कहा। शायद उस आदमी ने मेरी आँखों की भाषा पढ़ ली हो। वह कहने लगा, "सर, आप पैसों की चिंता मत कीजिए। आपको यहाँ अभी केवल दस प्रतिशत अग्रिम राशि देनी पड़ेगी। मैं साड़ी वी.पी.पी से भेज दूँगा। सिर्फ आप अपने घर का पता दे दीजिए। वी.पी.पी. मिलने के बाद आप उसे अपने वहाँ के पोस्ट ऑफिस से छुड़ा लेंगे।"
गाइड़ की यह बात सुनकर सरोजिनी ने मन ही मन एक साड़ी खरीदने का निश्चय कर लिया। अगर अभी नाम मात्र का पैसा देना है तो फिर उसमें क्या परेशानी की बात है ?
मैने उसके सामने एक और शर्त रखी, "और वी.पी.पी. का खर्च कौन देगा ?"
उस आदमी ने समझ लिया कि मछली जाल में फँस गई है। वह कहने लगा, "आप निश्चिन्त रहिए, आपको वह खर्च वहन नहीं करना पड़ेगा। ऐसा ही समझिए मुझे इस साड़ी पर मिलने वाला कमीशन मार खा गया।"
वहाँ से लौटने के बाद सरोजिनी बहुत खुश थी। उसे ऐसा लग रहा था मानो वह किला जीतकर आई हो। होटल में पहुँचने पर मैनेजर हँसकर बतलाने लगा, "अगर आप अच्छी साड़ी खरीदना चाहती हो तो राज्य हैंडलूम निगम के शो-रुम से लीजिएगा। इस शहर में उससे बढ़कर और कोई विश्वसनीय तथा अच्छी दुकान नहीं है। अगर आपको उसका पता चाहिए तो मैं दे देता हूँ।"
मैनेजर की बात सुनकर सरोजिनी का मुँह सूख गया। वह सोचने लगी, तीस रुपए व्यर्थ चले गए। वे ठगे गए हैं। होटल का मैनेजर इस तरह हँसने लगा कि हम उसका अभिप्राय अभी तक समझ नहीं पाए।
उड़ीसा वापिस लौटते समय हमारे पास की बर्थ पर एक सज्जन आदमी बैठा हुआ था, बहुत मिलनसार तथा सहयोगी स्वभाव का। बहुत जल्दी ही वह सरोजिनी और दोनों बच्चों के साथ घुम-मिल गया। निसंकोच भाव से वह अपने बारे में बतलाने लगा कि वह ज्यादा पढ़ा-लिखा तो नहीं है। उसका गाँव में कपड़ा बुनाई का काम है। उसके छोटे भाई ने पुश्तैनी काम छोड़कर अच्छी-खासी पढ़ाई की और आज वह ज्योतिविहार में गणित विभाग का प्राध्यापक है। वह खुद दो बार उड़ीसा आया था मगर उसे वहाँ जाने के रास्तें याद नहीं हैं।
उसकी सरलता तथा फ्रेंकनेस ने हमें मोहित कर दिया था। यह जानकर वह बुनकर जाति का आदमी है, सरोजिनी उसे साड़ी खरीदने का किस्सा सुनाने लगी। सरोजिनी की बाते सुनने के बाद वह आश्चर्य चकित होकर कहने लगा, "जिस साड़ी के बारे में आप बता रही हो, उस साड़ी की कीमत कम से कम पाँच सौ से कम नहीं होगी, क्योकि आज के जमाने मे साड़ी बनाने का कच्चा माल भी दौ सौ नब्बे रुपए में नहीं मिल सकता है।"
सरोजिनी के मुँह का रंग फीका पड़ने लगा। अपने घर पहुँचने के बाद मैने पोस्टमास्टर से पूछा था, "मेरे नाम की एक वी.पी. आने वाली थी। आई है क्या ?
"नहीं, अभी तक तो कोई वी.पी. नहीं आई है। मगर मुझे कुछ ऐसे षड़यंत्रों की जानकारी जरुर है। डाक में तइस प्रकार के वी.पी.पी पैकेटों में ठगी का कारोबार होता है। कई बार तो मैने खुद ने रेड़ियों के बदले पत्थर और घड़ी के बदले कागजों के गुच्छे निकलते हुए देखा है इस तरह के पैकेटों में से। अच्छा यही रहेगा, आप उस वी.पी. पैकेट को नहीं छुड़ाए।"
इतना सब सुनने के बाद सरोजिनी ने मुझे अपने मन की बात बता दी, मुझे और उस साड़ी के प्रति कोई मोह नहीं है। मगर वह और मैं हर दिन वी.पी. आने की प्रतीक्षा करते थे। पोस्टमेन कभी घर आता था, तो कभी नहीं। कभी- कभी सरोजिनी मुझे यह प्रश्न करती थी, "बिना मतलब के तीस रुपए पानी में चले गए ? वह आदमी महा-ठग था। था ना ?"
इस प्रकार हमने प्रतीक्षा करते-करते उस वी.पी. पैकेट की आशा तक छोड़ दी थी । एक दिन पोस्टमेन ने आकर खबर दी, आपके नाम दौ सौ साठ रुपए की वी.पी. पी आई है। इसकी यह इंटीमेशन है। दो सौ साठ रुपया.....। वही सुंदर साड़ी जिसे वे देखकर आए थे। सरोजिनी विचलित होने लगी। मैने पोस्ट ऑफिस जाकर उस पैकेट को ध्यानपूर्वक देखा। बाहर से बिल्कुल भी पता नहीं चल रहा था कि भीतर साड़ी पैक की हुई है या कोई और चीज। अगर भीतर में साड़ी हुई भी तो यह क्या जरुरी है, वही साड़ी होगी जिसको हमने पसंद किया था। एक दिन, दो दिन, देखते-देखते तीन दिन बीत गए। कभी-कभी मन हो रहा था कि वी.पी. के पैकेट को छुड़ा लेने से ठीक रहता, तो कभी-कभी मन हो रहा था कि उस पैकेट को लौटा ही देते ताकि सारा किस्सा ही खत्म हो जाता । सरोजिनी मुझे विरक्त भाव से कहने लगी, "आप घर के मुखिया हो। आप एक अंतिम निर्णय ले लो, क्या करना है ?"
मैं उसके इस सवाल से बुरी तरह चिढ़ गया और कहने लगा "साड़ी पहनोगी तुम और निर्णय लूँगा मैं, यह कहाँ की बात है ? अच्छा होगा, लेनी है अथवा नहीं, तुम्हीं बता दो।"
अंत में, मैं इस सिद्धांत पर पहुँचा कि किसी भी मनुष्य को दूसरे मनुष्य के ऊपर इतना अविश्वास करना अच्छी बात नहीं है। आखिरकर हमें उन लोगों के बारे में जरुर सोचना चाहिए। सूखी पावरोटी चबाते हुए वे नंग-धडंग बच्चें, नवजात शिशु की वह माँ जिसके स्तन में दूध सूख गया हो, कटोरी में रखी हुई लाल चाय जिसे पीना भी भूल गया था फटी गंजी और मैली लुंगी पहने हुआ वह वृद्ध बुनकर जो नौ सौ रुपए की साड़ी बना रहा था उन लोगों के बारे में जरुर हमें ध्यान देना चाहिए। कुछ भी नहीं तो उन लोगों की खातिर तो इस पैकेट को छुड़ा ही लेना चाहिए।
दो सौ साठ रुपए लेकर मैं पोस्ट ऑफिस गया था। वी.पी.पी पैकेट को कई बार मैने उलट-पुलट कर दखा। दो सौ साठ रुपए.... मतलब मेरे खून-पसीने की कमाई का दसवाँ हिस्सा। इतने पैसों से दूध वाले का एक महीने का बिल चुकाया जा सकता है। यह नहीं तो, कम से कम, तेल, नमक, मसाला और दाल वगैरह एक महीने का परचूनी सामान खरीदा जा सकता है। मान लेते हैं यह भी नहीं तो, दो सौ साठ रुपए में बच्चों की स्कूल ड्रेस और जूते तो खरीदे जा सकते हैं। इलैक्ट्रिक बिल इस बार अभी तक भरा नहीं गया है। दो सौ साठ रुपए को मैं अपनी जेब में हाथ डालकर मजबूती से पकड़ रखा था। ऐसा लग रहा था मानो वह गाइड़ मेरे सामने खड़ा हो तथा जबरदस्ती से मेरी जेब से दो सौ साठ रुपए निकालना चाहता हो। तुरंत मैने वह पैकेट पोस्टमास्टर को लौटा दिया, यह कहते हुए कि आप इसे शीघ्र वापिस वहीं भेज दें जहाँ से यह आया हो। यह कहकर मैं हड़बड़ाते हुए वहाँ से निकल गया।

Comments

  1. बहुत ही सुंदर रचना.....!
    मानवीय परिस्थितियों का बहुत ही भावुक चित्रण किया है, आपने

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  2. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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