स्तब्ध-महारथी

यह कहानी लेखक के कहानी संग्रह 'दक्षिण दुआरी घर' से ली गई है . कहानी सत्तर दशक में लिखी गई थी और उस समय की एक चर्चित कहानी मानी जाती है. कहानी में व्यक्ति के अकेलेपन, असहायपन और मानवीय संबंधों के खोखलेपन को बखूबी दर्शाया गया है. आशा है यह कहानी पाठकों को आज भी उतनी ही पसंद आयेगी जितनी आज से चालीस साल पहले .


स्तब्ध-महारथी


अपने द्रव्य दूसरों को देकर,
शिव चले गए नंगे होकर।

( ओडिशा की एक लोकोक्ति)

जिस दिन स्वामी शिवानंद की किताब अरुणाभ के घर आई उसी दिन दिव्येन्दू भी अरुणाभ के घर आया। स्वामी शिवानंद की उस किताब का नाम था, "प्रेक्टिकल लेसन इन योगा"। क्राउन साइज के पेपर बेक संस्करण वाली अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब में शिवानंद के जीवन-दर्शन, योग-साधना, समाधि और इश्वर उपलब्धि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। दिव्येन्दू जिसकी लंबाई पाँच फुट चार इंच तथा आँखों पर ज्यादा पावर के चश्मे लगाए हुए एक ह्मष्ट-पुष्ट, काला-कलूटा प्राइवेट छात्र जिसे काÏस्टग की परीक्षा देनी थी। वह प्रेशर कुकर में खुद अपा खाना बनाता था। वह बहुत दुःखी रहता था। इस वजह से वह दया का पात्र था। रहन-सहन उसका इतना साधारण था कि वि·ाास नहीं किया जा सकता था। आज के जमाने में भी वह अपने सिर के बालों को बहुत छोटा-छोटा कटवाता था और उन कम बालों में तेल ज्यादा लगाता था। पहनने में वह अपने लिए प्रयोग करता था चौदह इंच लंबी मोरी की बेल बॉटम पैण्ट। एक संस्था में वह एकाऊंटस क्लर्क के रुप में कार्यरत था।

मगर अरुणाभ की तुलना ना तो शिवानंद के साथ की जा सकती थी और ना ही दिव्येन्दू के साथ। अरुणाभ एक टेक्निकल एडवाइजर के रुप में काम करता था। वह लंबे-लंबे बाल रखता था तथा एक बोहेमियान की भाँति इधर-उधर भटकता रहता था।........

यहाँ तक कि वह अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं करता था। और न ही भविष्य के लिए सपने देखता था. वह किसी के घर में पेइंग-गेस्ट के रुप में रहता था। भगवान के अस्तित्व के बारे में वह किसी से तर्क-वितर्क नहीं करता था। उसके जीवन के सबसे बड़ी बात थी, वह अपने आपको किसी नियम और अनुशासन के ढाँचे में बाँधकर नहीं रखता था। मगर वह कहानी-कविता लिखने का शौकीन था। अरुणाभ की अपने बारे में एक अजीबो-गरीब धारणा थी कि लोग उसे समझ नहीं पा रहे हैं। इसके अलावा, उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी चीजें है जिसके कारण शुरु-शुरु में लोग उसकी ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आते हैं, लेकिन जैसे ही वे उसके पास आ जाते हैं, वैसे ही स्टैटिक इलेक्ट्रीसिटी के नियमों की भाँति उसके व्यक्तित्व का वह आकर्षण इस तरह शून्य हो जाता है कि सामने वाले वे लोग केवल उससे दूर भाग जाते हैं वरन कभी-कभी जानलेवा शत्रु भी बन जाते हैं। इस वजह से अरुणाभ अधिकतम समय अकेले रहना पसंद करता है। अकेलापन उसकी साँसों में हमेशा के लिए बस गया है, तथा वही अकेलापन उसके खून और अस्थिमज्जा में हमेशा-हमेशा के लिए घुल गया है। बिना अकेलेपन के क्या वह सहज ढंग से जिंदा रह पाएगा ? इस प्रश्न का हल खोजते -खोजते वह कहीं खो जाता था। ठीक उसी अनसुलझे प्रश्न की तरह अरुणाभ के पास शिवानंद की किताब और दिव्येन्दू दोनों एक साथ आए। इन दोनों को लेकर अरुणाभ दुविधा में पड़ गया था, क्योंकि उन दोनो का उसकी जीवन-पद्धति के साथ ताल-मेल नहीं बैठता था। बचपन से ही योग-साधना में अरुणाभ की कोई रुचि नहीं थी। मगर अभी योग-साधना करने वाले अपने एक दोस्त का सान्निध्य पाकर उसका इस तरफ झुकाव हो गया था। उसके मन में एक आकांक्षा पनपी थी, भले उसे ईश्वर प्राप्ति नहीं हो मगर सार्वभौमिक सत्ता का लेशमात्र अनुभव भी उसके जीवन को सार्थक बना देगा। जीवन के उसी संक्रमण काल में दिव्येन्दू उसके पास आकर कहने लगा था, उसे कॉÏस्टग का इम्तिहान देना है। उसे कहीं पर एक अच्छा घर नहीं मिल पा रहा है। इधर कंपनी भी उसे क्वार्टर नहीं दे रही है। अगर उसे कोई आपत्ति नहीं हो तो वह उसके साथ रहेगा। अरुणाभ के लिए यह बड़ी दुबिधा की घड़ी थी, क्योंकि वह जानता था कि उसका किसी के साथ एडजस्ट होकर चलना बहुत मुश्किल है। इतना होने के बावजूद भी वह दिव्येन्दू को उसके मुँह पर मना नहीं कर पाया।अगले दिन उसने बाजार से शिवानंद की किताब खरीदी। उसी दिन दिव्येन्दू अपने टेबल, खाट-बिछौने, बेडिंग, बक्से, रसोई के सामान, किताबें, कॉपियों सहित पहुँच गया था अरुणाभ के घर। एक तरफ शिवानंद की किताब अरुण्भ के मन पर अपना अधिकार जमाने लगी थी, दूसरी तरफ दिव्येन्दू अरुणाभ के घर पर अपना अधिकार जमाने लगा था।

अरुणाभ का क्वार्टर एक फ्लैट के ऊपर वाली छत पर स्तिथ था. वह फ्लैट राऊरकेला शहर के मध्मवर्गीय परिवारों के लिए आकर्षण का एक केन्द्र था। उसके क्वार्टर में दो कमरे थे। अगर एक कमरे को बेडरुम तथा दूसरे को ड्राइंग रुम कहने से कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन दो कमरों के बीच एक खाली जगह थी, वह जगह डायनिंग हॉल के काम में आती थी। मगर उस जगह में केवल एक डायनिंग टेबल ही रखा जा सकता था। इसके अलावा इस क्वार्टर में लेट्रिन, बाथरुम, किचन आदि की सुबिधा थी। वहाँ के लोग इस तरह के क्वार्टर को 'वन.बी.आर (वन बेड रुम)' टाइप का क्वार्टर करते थे।

दिव्येन्दू ने आते ही पहले बेडरुम से अरुणाभ की खटिया को बाहर निकालकर ड्राइंग रुम में रख दिया और अपनी खटिया को बेडरुम में बिछा दिया। इस खटिया के पास एक सेंट्रल टेबल और दो कुर्सी लगा देने के बाद और एक खटिया रखने की जगह नहीं बच पा रही थी। फिर दिव्येन्दू ने आदेश देने के लह्जे में अरुणाभ से कहा, "ड्राइंग रुम में उसको सोने में कोई परेशानी तो नहीं है ?"

उसकी बात सुनकर अरुणाब के दिल को ठेस जरुर लगी, मगर उसका स्वभाव इस तरह का था कि वह मुँह खोलकर किसी का विरोध नहीं कर पाता था। इस कारण वह दिव्येन्दू को भी कुछ नहीं बोल पाया। अरुणाभ की किताबें, कहानियों की पांडुलिपी, पत्र-पत्रिकाओं से भरे रेक को एक कोने में खिसकाकर उसने अपने कोर्स की किताबों को उस जगह पर सजा दिया। बेडरुम की दीवार पर लटक रहे अरुणाभ के कपड़ों को उतारकर उसने ड्राइंगरुम की दीवार पर टंगे एक हैंगर पर लटका दिया । तभी अरुणाभ के मुँह से चुँ तक नहीं निकली । वह अच्छी तरह समझ गया था कि आज के बाद उसको उसके ही घर में एक शरणार्थी की तरह रहना पड़ेगा।

ड्राइंग रम में पहले ही दिन से अरुणाभ को कई कष्टों का सामना करना पड़ा। दिन-रात वहाँ मच्छरों की भरमार तथा तेज गर्मी से वह असुलाने लगा। सीलिंग फैन तो केवल बेडरुम में ही लगा हुआ था। ड्राइंग रुम में मच्छर दानी लगाने से गर्मी लगने लगती थी और अगर मच्छरदानी नहीं लगाई जाए तो मच्छर काट-काटकर हालत खराब कर देते थे। उसकी यह दशा देखकर दिव्येन्दु ने अरुणाभ को बेडरुम में सो जाने के लिए कहा था। उसके लिए उसने अपने टेबल-चेयर एक तरफ खिसकाकर फर्श पर दरी बिछा दी थी। मगर वहाँ सोने के लिए अरुणाभ ने इंकार कर दिया था क्योंकि उसका मन इस बात के लिए गवाही नहीं दे रहा था कि दिव्येन्दु खाट के ऊपर सोएगा और वह घर का मालिक होकर भी नीचे फर्श पर बिछी हुई उस दरी पर जिसके पास दिव्येन्दु की चप्पलें रखी गई होगी। उसका यह व्यवहार तो उसे ऐसे लग रहा था मानो वह उसके घर का एक नौकर हो। उसे यह सब बेहद अपमानजनक लग रहा था। मगर दिव्येन्दु ने इन सब बातों को इस तरह बेफिक्र होकर कहा था, जैसे उसके इस प्रस्ताव से अरुणाभ को दुखी होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

उस दिन दुखी होकर अरुणाभ अपनी खटिया, बिछौने, मच्छरदानी समेत शिवानंद की किताब को लेकर छत के ऊपर सोने के लिए चला गया। सोने से पूर्व कुछ न कुछ पढ़ने की आदत थी उसकी. छत पर अंधेरा होने की वजह से जबरदस्ती वह सोने की चेष्टा करने लगा, मगर उसे नींद नहीं आ रही थी। तब नीचे जाकर उसने एक मोमबत्ती जलाई और उसे जलाकर खाट के पैर के ऊपर सावधानी से रखा. फिर मच्छरदानी के भीतर घुसकर ध्यानपूर्वक शिवानंद की किताब पढ़ने लगा। मगर बीच-बीच में उसका ध्यान दिव्येन्दु द्वारा किए जा रहे दुव्र्यवहार की तरफ चला जाता था। यह सोचकर उसका मन दुखी हो रहा था। इसी दौरान उसकी नजर शिवानंद की एक कविता के ऊपर पड़ी। कविता की पहली पंक्ति इस प्रकार थी -

"एडॉप्ट, एडजेस्ट, एकमोडेट

बीयर इन्सल्ट, बीयर इन्जूरी

दिस इज द हाईएस्ट साधना"

शिवानंद जी की इन पंक्तियों को पढ़कर अरुणाभ इस तरह प्रभावित हो गया था कि वह केवल इन्हीं पंक्तियों को बारम्बार दोहरा रहा था। यहाँ तक साधना को करने के लिए मानसिक रुप से तैयार भी हो गया था।

भले कुछ हो या नहीं हो, शिवानंद की किताब अरुणाभ के जीवन में एक अनुशासन को ले आई तथा दिव्येन्दु के आने ने घर की स्वच्छता को एक नया मोड़ प्रदान किया। कभी अरुणाभ के स्वभाव में अनुशासन का नामो-निशान नहीं था। ना ही खाने में, ना ही नहाने में और ना ही कहानी लिखने में। कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि वह अपने बिछौने तक नहीं समेटता था। और यहाँ तक कि घर में झाडू लगाने जैसे रोजमर्रा के काम करना या तो वह भूल जाता था या फिर उनकी अनदेखी कर देता था। वहीं अरुणाभ आजकल पूरी तरह बदल गया था। आजकल वह सुबह चार बजे उठने लगा था। शिवानंद की किताब में जैसे-जैसे निर्देश दिए गए थे, ठीक वैसे ही उनके अनुकरण करता था। यहाँ तक बिना दंत मंजन किए तथा बिना स्नान किए एकाग्रता के लिए ध्यान की मुद्रा में बैट जाता था केवल मुँह धोकर ही। मगर ध्यानावस्था में उसका बेलगाम मन इधर-उधर भटकता था छुट्टी होने पर स्कूल से लौटते हुए बच्चे की तरह। अरुणाभ यह कहकर अपने मन को सांत्वना देता था कभी न कभी वह दिन जरुर आएगा जब उसका मन स्थिर हो जाएगा तथा ध्यान लगने लगेगा. यही सोचकर वह अपनी कोशिश जारी रखता था।

दिव्येन्दु के आने से उनका घर एक आदर्श घर की भाँति तरोताजा लगने लगा था। पहले की तरह अभी उसे अपने घर में बिखरी हुई किताबें तथा फर्श पर इधर-उधर गिरे सिगरेट के टुकड़े देखने को नहीं मिल रहे थे, छत के कोनों पर मकड़ी के जाले भी नजर नहीं आ रहे थे तथा पंखे की पंखुडियाँ भी साफ-साफ दिखने लगी थी। आजकल घर में दो बार झाडू लगाया जाता था। इतना कुछ होने के बाद भी अरुणाभ को ऐसा लग रहा था जैसे वह भीतर से टूट गया हो और उसका ये घर अब उसका नहीं रहा हो। वह अब एक शरणार्थी की भाँति जिंदगी जीने लगा है। जिसका मुख्य कारण था शिवानंद की वह कविता। अरुणाभ मन ही मन उस कविता को दोहराता रहता था, एडॉप्ट, एडजस्ट और अकमोडेट बीयर इन्सल्ट, बीयर अन्जूरी, दिस इज द हाइएस्ट साधना। जिस दिन से उसने कविता पढ़ी थी उसी दिन से अरुणाभ दिव्येन्दु के साथ एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था। इसी वजह से उसने आजतक दिव्येन्दु के स्वार्थी स्वभाव के खिलाफ अपना मुँह नहीं खोला। उस दिन से ही वह सोने लगा रात को कभी छत के ऊपर, कभी ड्राइंग रुम के अंदर गर्मी के भीतर। वह सारे कष्टों को इस तरह सहन किए जा रहा था मानो वे कष्ट उसके लिए बिल्कुल असह्य नहीं रहे।

अरुणाभ अपनी पढ़ाई-लिखाई के लिए दिव्येन्दु के टेबल का उपयोग करता था। एक तरफ दिव्येन्दु बैठता था तो दूसरी तरफ वह स्वयं। दिव्येन्दु की आदत थी रात को ग्यारह बजे तक पढ़ने की। उसके बाद वह कमरे की लॉइट बंद करके सो जाता था क्योंकि उसे अंधेरे में सोना पसंद था। जबकि अरुणाभ की कोई नियत समय-सारणी नहीं थी। वह कभी रात को आठ बजे सो जाता था तो कभी पूरी रात कहानी लिखता रहता था।

एक दिन की बात है। रात के ग्यारह बज रहे थे। टेबल पर बैठकर दोनो पढाई कर रहे थे। दिव्येन्दु के सोने का समय हो गया था जबकि अरुणाभ कहानी लिखने में व्यस्त था। जब दिव्येन्दु से रहा नहीं गया तो उसने कमरे की लाइट बुझा दी तथा अपने बिस्तर पर सोने चला गया यह कहते हुए "अरुणाभ, मुझे जोरो से नींद आ रही है। तुम दूसरे कमरे में जाकर अपनी कहानी लिखो।"

दिव्येन्दु, ने विनीत भाव से अरुणाभ से यह बात कही, क्योंकि अरुणाभ से आँखे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। जबकि अरुणाभ का व्यक्तित्व इस तरह बदल गया था उसने आवेग में आकर न तो दिव्येन्दु से कुछ कहा और न ही स्विच ऑन किया। वह तो यह भी नहीं कह पाया "देखो, यह अरुणाभ का घर है। यहां अरुणाभ का हुक्म चलेगा। जब तक उसकी मर्जी होगी तब वह यहाँ बैठकर पढ़ेगा।"

मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। भीतर ही भीतर दिव्येन्दु के इस तरह के व्यवहार से वह अपने आपको बहुत दुखी तथा अपमानित अनुभव कर रहा था। तब भी अपने क्रोध पर नियंत्रण करके एक अपराधी की तरह अपने कागज-पत्र उठाकर ड्राइंग रुम की खटिया पर जाकर अपनी कहानी लिखना शुरु कर दिया । मगर आंतरिक अंतर्द्वंद्व ने उसको अस्थिर कर दिया था। तुरंत वह छत के ऊपर जाकर टहलने लगा। मन ही मन दिव्येन्दु के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का संकल्प लेते हुए आकाश की तरफ देखने लगा। लेकिन जब वह अपने कमरे में लौटा तो उसने देखा दिव्येन्दु सो चुका था।

अरुणाभ के योग-साधना के अभ्यास के बारे में दिव्येन्दु जान चुका था। जब कभी भी अरुणाभ ध्यानावस्था में बैठने का प्रयास करता था, तब दिव्येन्दु जान-भूझकर उसके पास जाने लगता था। उसके पैरों की आवाज सुनकर अरुणाभ की साधना भंग हो जाती थी। शायद दिव्येन्दु को ऐसा लगता होगा कि योग साधना बच्चों का खेल हो। दिव्येन्दु की उपस्थिति उसकी साधना में बार-बार खलल पैदा कर रही थी। फिर अपने आप पर नियंत्रण कर उसने दिव्येन्दु को कुछ नहीं बोला। ठीक ऐसे समय पर शिवानंद की किताब की वे बातें उसे याद आने लगती थी, योग-साधना के लिए एक एकांत कमरा होना चाहिए। हमेशा खिड़की दरवाजे बंद होने चाहिए। कमरे के अंदर अपने ईष्ट देव का एक फोटो या कोई प्रतिमा, ईसा मसीह का चित्र, मदर मेरी का चित्र या काबा की मस्जिद का चित्र अवश्य होना चाहिए। जहाँ कमरे के भीतर योगाभ्यास के लिए एक कंबल बिछा देना चाहिए। घर के सारे कमरों में सुवासित अगरबत्तियाँ अवश्य जलानी चाहिए। इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कमरे के भीतर आलतू-फालतू सामान नहीं रखा जाए। वास्तव में ऐसा होना चाहिए कि जैसे ही हम कमरे के भीतर प्रवेश करे वैसे ही वहाँ का शुद्ध वातावरण आपको अपनी तरफ आकर्षित कर ले। अगर किसी कारणवश आपको अलग से पूरा कमरा नहीं मिलता है तो कोई बात नहीं, आप कमरे के किसी कोने में कपड़े से घेरकर एक छोटी-सी जगह में अपने लिए उपासना-गृह बना सकते हो।

किताब की ये सारी बातें याद आते ही अरुणाभ का मन ग्लानि से भर गया। अगर दिव्येन्दु उसके घर में नहीं रह रहा होता तो शायद दिव्येन्दु के कमरे को अपनी उपासना के लिए अलग से रख लेता। अब यह कमरा इस कार्य के लिए मिलना मुश्किल है। उसको बार-बार ऐसा लगने लगा मानो दिव्येन्दु उसके ऊपर बोझ बनकर बैठा हुआ हो तथा उसकी सारी इच्छाओं की चाबी उसने ले ली हो।

बात यहाँ तक होती तब भी कोई बड़ी बात नहीं थी। मगर दिव्येन्दु ने बातोबातो में एक दिन उसकी योग साधना पर करारा व्यंग कस दिया। उसके उत्तर में अरुणाभ ने उसको प्राणायाम से लेकर ध्यान, धारणा और समाधि तक के सारे विषयों पर पर्याप्त प्रकाश डाला। उसके इस दर्शन का उपहास उड़ाते हुए दिव्येन्दु ने उसका नया नामकरण कर दिया "मिस्टर शिवानंद"।

उसके अगले दिन प्रभात की शुभ वेला में, अरुणाभ पद्मासन लगाकर अपनी दोनो भृकुटियों के मध्य मन को स्थिर कर एकाग्रता की चरम अवस्था प्राप्त करने के लिए महाप्रभु जगन्नाथ के निराकार स्वरुप का ध्यान करने लगा। तभी उसका मन इधर-उदर भटकने लगा। उसको लगने लगे जैसे कोई उसके कान में जोर-जोर से दिव्येन्दु की नकल करते हुए चिल्लाकर बुला रहा हो - मि. शिवानंद, मिं. शिवानंद।

कानों के परदों से टकराकर इस आवाज की प्रतिध्वनि फैलती जा रही थी - मस्तिष्क से लेकर चेतना के उच्चतम स्तर तक।

एकाएक अरुणाभ का ध्यान भंग हो गया। वह उठकर खड़ा हो गया। शिवानंद की किताब फिर उससे कहने लगी - उसने केवल तुम्हारे शरीर, मन और अहंकार का अपमान किया है। मगर तुम तो इन तीनों चीजों से ऊपर हो। तुम यथार्थ में वह नहीं हो जिसे तुम समझ रहे हो। उसने तुम्हारे असली स्वरुप का अपमान नहीं किया है क्योंकि तुम्हारे असली स्वरुप में तो वह खुद भी शामिल है। सही शब्दों में उसने तुम्हारी चेतना के निम्न धरातल पर छिपे अहंकार का अपमान करके तुम्हारी सहायता की है ताकि तुम अहंकार शून्य होकर अपनी योग साधना के मार्ग में तेजी से आगे बढ़ सको।"

शिवानंद की किताब से मिले मार्गदर्शन पर बहुत देर तक मन ही मन विचार-विमर्श करने के बाद अरुणाभ इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आगे से वह ज्यादा से ज्यादा चुपचाप रहने की कोशिश करेगा तथा दिव्येन्दु के साथ कम से कम बातचीत करेगा।

शिवानंद की किताब और आगे मार्गदर्शन करते हुए निर्देश देने लगी "लौकिक जगत को मिथ्या समझकर ही मनुष्य अपनी चेतना शक्ति का विस्तार कर सकता है । भूख और प्यास तुम्हारे शरीर और मन पर अपना अधिपत्य जमाकर रखती है। जब तुम अपनी प्रकृति, इच्छा -सक्ति और अनुभूतियों के ऊपर नियंत्रण रखने की क्षमता में वृद्धि करोगे, तब तुम देखोगे तुम्हारे भीतर एक अभूतपूर्व मानसिक शक्ति का विकास हो रहा है। और यह मानसिक शक्ति ही तुम्हारी साधना के लिए साध्य का काम करती है।"

शिवानंद की किताब का अनुकरण करते हुए जहाँ अरुणाभ ने अपनी खटीया के ऊपर केवल दरी को छोड़कर सारे बिछौने-चद्दरों की पोटली बाँधकर खटिया के नीचे पटक दिया , वहाँ दिव्येन्दु उसी दिन अपने सोने के लिए एक नरम-सा गद्दा खरीदकर ले आया तथा आधे घंटे तक उसकी तारीफ के पुल बाँधने लगा। जब दिव्येन्दु घर की सफाई कर रहाथा तथा अरुणाभ की खटिया के नीचे मिली उस पोटली को उठाकर अपने बेडरुम के वेन्टीलेटर के पास दीवार में बनी अलमारी में पटक दिया ।

पोटली को इस तरह पटकना महज सामान्य बात हो सकती है, मगर अरुणाभ को लगा कि दिव्येन्दु ने घृणा तथा अवहेलना के साथ एक बड़ा-सा पत्थर उसके नीचे फेंक दिया हो। केवल दरी बिछाई हुई खाट के ऊपर सोते-सोते अरुणाभ सोचने लगा, क्या दिव्येन्दु के ऐसे व्यवहार के लिए प्रतिक्रिया व्यक्त करना उसके लिए उचित होगा ? क्यों नहीं होगा उचित ? निश्चित तौर पर उसे दिव्येन्दु के व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करनी चाहिए। नहीं, नहीं, उसका क्रोध करना उचित नहीं है, कम से कम साधना-पथ पर अग्रसर होने के लिए तो उचित नहीं है।

ऐसे ही अन्तद्र्वन्द तथा दुविधा के बीच झूलते हुए वह शिवानंद की किताब पलटने लगा। उसके मस्तिष्क में शिवानंद की वह कविता घूमने लगी - एडॉप्ट, एडजस्ट, एकमोटेड, बीयर इनसल्ट, बीयर इन्जुरी, दिस इज द हाइएस्ट साधना।

मगर ऐसी बहुत सारी छोटी-मोटी घटनाएँ थी जो अरुणाभ को बीच-बीच में विचलित कर देती थी, जैसे दिव्येन्दु का चिल्ला-चिल्ला कर जोर-जोर से पढ़ना अरुणाभ के कहानी लिखने के समय में रेडियो चलाकर हिंदी फिल्मों के गीत सुनना अपनी बड़ी-बड़ी डींगें हाँकना कि उसने भी अपने बचपन में अच्छी-अच्छी कहानियों की रचना की है इत्यादि। अरुणाभ के सारे हैंगरों पर दिव्येन्दु ने अपने शर्ट-पैण्ट टाँग दिए थे, इसलिए बाध्य होकर अरुणाभ को अपने कपड़े रस्सी के ऊपर लटकाने पड़ रहे थे। अरुणाभ के साबुन-केस में दिव्येन्दु अपना साबुन रख देता था, इसलिएअपना साबुन कागज में लपेट कर रखने के लिए अरुणाभ मजबूर हो जाता था। रात को ग्यारह बजे इधर-उधर घूम फिरकर जब अरुणाभ घर लौटता था, तब नींद से उठकर दरवाजा खोलते समय दिव्येन्दु उलटा पुलटा बोलने लगता था। इन सभी बातों को लेकर अरुणाभ का मन बुरी तरह से आहत हुआ था। हर समय शिवानंद की किताब उसे उपदेश देती थी -अहंकार शून्य होने के लिए, स्वार्थ रहित होने के लिए तथा सारे सांसारिक सुख दुख से ऊपर उठकर स्थितप्रज्ञ हो जाने के लिए।

एक बार जरुर शिवानंद की किताब के उपदेश अरुणाभ के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सके।, जब वह सायं भ्रमण करके रात को ग्यारह बजे घर लौटा। उसने देखा उसके घर के बाहर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था। ताला लगाकर दिव्येन्दु कहीं बाहर गया हुआ था।

अपने ताले की चाबी अरुणाभ दिव्येन्दु को पहले से दे चुका था, मगर इस आधी रात को दूसरा ताला लगाकर दिव्येन्दु किस तरह खुशी से बाहर चला गया ? सीढ़ी गिनते-गिनते अरुणाभ नीचे उतर गया तथा बाहर रास्ते पर चहल कदमी करते-करते उसका इंतजार करने लगा। मगर दिव्येन्दु का कोई ठिकाना नहीं था। इधर-उधर चक्कर काटते-काटते अरुणाभ बुरी

तरह से हताश हो गया था और दिव्येन्दु के ऊपर उसका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था। मन ही मन उसे कोसने लगा। इस बार उसने मन में निश्चय कर लिया कि जैसे दिव्येन्दु घर लौटेगा, वह उसे स्पष्ट तौर पर घर खाली करने के लिए कह देगा। लेकिन अभी तक दिव्येन्दु का कोई अता-पता नहीं था। अंत में थकहार कर उसने अपने पडोसी नायर बाबू के घर का दरवाजा खटखटाया तथा आधी रात में उन्हें नींद से जगाकर उनके घर के भीतर से होते हुए छत पर जाने की अनुमति माँगी, क्योंकि अरुणाभ के छत पर जाने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते थे। एक अपने घर के अंदर से होकर तथा दूसरा उसके पडोसी नायर के घर के अंदर से होकर।

अपने पडोसी नायर की दया से भले ही वह अपनी छत के ऊपर जा पाया, मगर वहाँ भी कितनी देर वह दिव्येन्दु का इंतजार करता ? शर्ट खोलकर बिना दरी के छत पर सो गया। इधर-उधर की सोचते हुए दिव्येन्दु को मन ही मन खूब कोसने लगा, यहाँ तक भगवान से उसके मर जाने की प्रार्थना करने लगा। रात भर आसमान में वह तारे गिनता रहा, मच्छरों के दंश से दुखी होकर इधर-उधर लोटता रहा। थकहार कब वह सो गया उसे पता ही नहीं चला। सुबह उठते ही गुस्से से आग-बबूला होकर वह दिव्येन्दु के पास गया। इससे पहले कि वह उसे डाँटता फटकारता, दिव्येन्दु से दूसरा ताला लगाकर जाने का कारण जानना चाहा। तब दिव्येन्दु ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया कि उसे एक जरुरी काम से स्टेशन जाना था और हड़बड़ी में उसे वह पुराने वाला ताला नहीं मिला, इसलिए उसने दूसरा ताला लगा दिया।

दिव्येन्दु का यह उत्तर सुनकर अरुणाभ ना तो उसको डाँट पाया, ना ही क्वार्टर छोड़कर जाने के लिए कह पाया और ना ही उसका सामान बाहर फेंक पाया। उसके मुँह से बिल्कुल भी आवाज नहीं निकली। वह पूरी तरह से निस्तब्ध था। केवल शिवानंद की कविता की स्वतः मन ही मन आवृत्ति होने लगी - अडॉप्ट, एडजस्ट, एकमोडेट......।

इसी तरह एक दिन और वह रात को ग्यारह बजे के आस पास घर लौटा। दरवाजा खटखटाने के काफी देर बाद दिव्येन्दु ने चिटकनी खोली। जैसे ही वह ड्राइंग रुम में घुसा, दिव्येन्दु उसके कान में फुसफुसाकर कहने लगा, "अरुणाभ, मेरी एक गर्लफ्रेण्ड आई हुई है। आज रात वह इस घर में रहेगी। प्लीज, आज एक दिन और तू छत पर सो जा। बस एक दिन एडजस्टमेंट की बात है।"

गर्लफ्रेण्ड ? या कालगर्ल ? इस छोटे से राउरकेला जैसे शहर में ऐसी भी कोई गर्लफ्रेण्ड हो सकती है क्या जो किसी जवान लड़के के साथ रात बिताएगी? दिव्येन्दु के बेडरुम का दरवाजा बंद था। कमरे में अँधेरा था. केवल पंखा चलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी, ऐसी स्थिति में अरुणाभ को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. अपने कपड़े बदलने के बाद हाथ मुँह धोकर बिना कुछ कहे अपना सोने का सामान लेकर वह छत के ऊपर चला गया। जैसे ही वह छत के ऊपर पहुँचा, दरवाजा बंद होने के साथ-साथ चिटकनी लगने की आवाज आई।

दिव्येन्दु के द्वारा इस तरह दरवाजा बंद करने की आवाज से वह गुस्से से जलभुनने लगा। अभी उसे क्या करना चाहिए ? फ्लैट में रहने वाले सभी लोगों को बुलाकर क्या उसे यह बता देना चाहिए कि दिव्येन्दु एक चालू लड़की को इस क्वार्टर में लेकर आया है ?

पहले-पहले तो वह यही करना चाहता था। मगर बाद में उसने अपने आपको यह करने से रोक लिया। छत के ऊपर मच्छरदानी लगाकर खाट के ऊपर दरी बिछाकर एक असहाय की भाँति अरुणाभ सो गया। वह क्वार्टर उसका अपना है, मगर वह शरणार्थी की जिंदगी जी रहा है।

एक चालू लड़की के साथ दिव्येन्दु कितने आराम से बेडरुम के अंदर सो रहा है। और कितने दिनों तक वह सहता रहेगा अपने अपमान और अवहेलना की धूल को ? और कितने दिन ? नहीं, बहुत हो चुका। अब उसे विरोध करना ही पडेगा। वह कायर पुरुष नहीं है, जो दिव्येन्दु द्वारा किए जाने वाले हर तरह के अत्याचार को सहन करेगा। वह भी एक इंसान है, उसकी भी कुछ अपनी व्यक्तिगत चीजें हैं, जिस पर उसका अपना अधिकार है। वह अपने इस अधिकार को क्यों तिलांजलि देगा ?

नहीं, इस बार वह दरवाजा खटखटाकर दिव्येन्दु को बाहर बुलाएगा तथा उस चालू लड़की के साथ घर के बाहर निकाल देगा यह कहते हुए "जानते हो, मैं इस घर का मालिक हूँ। समझे या नहीं ? तुम पर दया कर बिना भाड़े यहाँ रहने की मैने अनुमति दी। इसका मतलब यह तो नहीं है कि ....... "

गुस्से से तमतमाकर अरुणाभ उठकर खड़ा हो गया था। वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा था. जैसे ही वह दरवाजा खटखटाने वाला ही था,तभी उसे लगा कि अचानक किसी ने उसके पाँव पकड़ लिए हो। वह शक्तिहीन हो गया। हाथ उठाकर दरवाजा खटखटाने की भी ताकत नहीं बची थी। उसे लग रहा था उसके तलवे पिघलते जा रहे हो। एक ठंडेपन की सिहरन उठती जा रही थी तलवों से घुटनों की ओर। शिवानंद की किताब ड्राइंग रूम के भीतर रह गई थी वरना उससे कुछ उपदेश, कुछ सांत्वना जरुर मिलती या किताब से कुछ उपाय पता चल जाता। वह बहुत मुश्किल से कुछ बोलने की चेष्टा करने लगा "शिवानंद, मैं क्या करुँ, शिवानंद ?"

मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। अरुणाभ पत्थर की मूर्ति की तरह ज्यों का त्यों खड़ा था। उसे बहुत कष्ट हो रहा था। उसके दोनों पाँव बर्फ की भाँति पिघलते जा रहे थे।


Comments

  1. Bahut Sundar Prasang.... Thnxx... Dinesh Ji... For Sharing...

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  2. this is good....but this is not a complete story...

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